मुंशी प्रेमचंद · 1924 · 3 मिनट का वीडियो

शतरंज के खिलाड़ी – प्रेमचंद की कहानी का सारांश, पात्र और उद्देश्य

शहर उनके पैरों तले से छिन रहा है, और वे बिसात से नज़र तक नहीं उठाते। फिर एक मोहरा पिटता है, और अचानक लड़ने की वजह मिल जाती है।

मूल कहानी का सारांश

नवाब वाजिद अली शाह का लखनऊ। शहर ऐश-ओ-आराम में डूबा है और राज-काज की किसी को फ़िक्र नहीं। दो रईस, मिर्ज़ा सज्जाद अली और मीर रौशन अली, सुबह से रात तक शतरंज खेलते रहते हैं।

मिर्ज़ा की बेगम इस शतरंज से तंग आ चुकी हैं। एक दिन वे मोहरे बाहर फेंक देती हैं और मीर साहब को भगा देती हैं। दोनों दोस्त खेल मीर साहब के घर ले जाते हैं, पर वहाँ भी किसी को उनका बैठना पसंद नहीं।

जब शाही अफ़सर रईसों को फ़ौज के लिए ढूँढने लगते हैं, तो दोनों डर के मारे रोज़ सुबह शहर से बाहर गोमती किनारे एक वीरान मस्जिद में चले जाते हैं, जहाँ कोई उन्हें परेशान न करे।

एक दिन कंपनी की फ़ौज नवाब को क़ैद करने जाती दिखाई देती है। मिर्ज़ा और मीर अपने बादशाह को गिरफ़्तार होकर जाते देखते हैं, पल भर अफ़सोस करते हैं और फिर बाज़ी में लग जाते हैं।

शाम तक मिर्ज़ा हार रहे होते हैं। एक चाल पर बहस होती है, बहस ख़ानदान की बेइज़्ज़ती तक पहुँच जाती है, और दोनों तलवारें निकाल लेते हैं। दोनों एक-दूसरे को मार डालते हैं। वीरान मस्जिद में, बिसात पर, दोनों बादशाह अपनी-अपनी गद्दी पर बैठे रह जाते हैं।

हमारा वीडियो कैसे अलग है

हमारे वीडियो में कहानी न्यूयॉर्क के अपर वेस्ट साइड में है। "कंपनी" पूरा मोहल्ला ख़रीद रही है, मिर्ज़ा और मीर अचार के प्यादों, बेगल के बादशाह और प्रेट्ज़ेल की रानी से खेलते हैं, और पार्क की शतरंज वाली मेज़ों पर छिप जाते हैं, जबकि "86वीं स्ट्रीट के बादशाह" सब कुछ साइन करके दे देते हैं।

तलवारों की जगह लड़ाई प्रेट्ज़ेल की रानी पर होती है, पर अंत वहीं होता है जहाँ प्रेमचंद का: बिसात पर अकेले खड़े दो बादशाह।

पात्र

मिर्ज़ा सज्जाद अली
अमीर रईस, जिसकी ज़िंदगी शतरंज है, और जिसकी बेगम उससे तंग आ चुकी है।
मीर रौशन अली
उनके दोस्त और शतरंज के साथी, उतने ही दीवाने और ज़रूरत के वक़्त उतने ही बेकार।
बेगम
मिर्ज़ा की पत्नी। कहानी में अकेली जो इस खेल की असलियत देखती है।
नवाब वाजिद अली शाह
अवध के नवाब, जिन्हें कंपनी क़ैद कर लेती है और उनके रईस देखते रह जाते हैं।

कहानी के विषय

उदासीनता

दोनों अपने बादशाह और मुल्क को छिनते देखते हैं और कुछ नहीं करते। प्रेमचंद का ग़ुस्सा उन लोगों पर है जो कुछ कर सकते थे पर नहीं करते।

ग़लत चीज़ के लिए वफ़ादारी

घर के लिए नहीं लड़े, पर एक मोहरे के लिए जान दे दी। पूरी कहानी इसी विडंबना पर टिकी है।

पतन

लखनऊ की ऐयाशी और बेफ़िक्री ही उसके इतनी आसानी से गिरने की वजह दिखाई गई है।

कहानी के अंत का मतलब

अंत कड़वा व्यंग्य है। जो दो लोग अपने बादशाह के लिए तलवार नहीं उठा सके, वे एक खेल के लिए एक-दूसरे को मार डालते हैं। शतरंज के बादशाह उनसे ज़्यादा टिकते हैं, अपनी गद्दी पर बैठे हुए, जबकि असली बादशाह क़ैद हो चुका है।

प्रेमचंद 1856 में अवध पर अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े की बात कर रहे थे, पर बात हर दौर की है: जो अपने आसपास की दुनिया से बेख़बर रहते हैं, वे उसे खो देते हैं और ग़लत चीज़ों के लिए लड़ते हैं।

छात्रों के सवाल

'शतरंज के खिलाड़ी' किसने लिखी?

मुंशी प्रेमचंद ने। यह 1924 में छपी और 1977 में सत्यजित राय ने इस पर फ़िल्म बनाई।

कहानी के मुख्य पात्र कौन हैं?

लखनऊ के दो रईस, मिर्ज़ा सज्जाद अली और मीर रौशन अली।

कहानी का अंत क्या है?

दोनों दोस्त एक चाल पर लड़ पड़ते हैं, तलवारें निकालते हैं और एक-दूसरे को मार डालते हैं। बिसात पर सिर्फ़ दोनों बादशाह बचते हैं।

कहानी का उद्देश्य क्या है?

उस समय के रईसों की ऐयाशी और उदासीनता पर व्यंग्य, जिनकी वजह से अवध अंग्रेज़ों के हाथ इतनी आसानी से चला गया।

मूल कहानी: शतरंज के खिलाड़ी, मुंशी प्रेमचंद (1924).

हर हफ़्ते नई कहानी, हर दिन नया Short

चेख़व, पो, प्रेमचंद और बाक़ी उस्तादों की कहानियाँ, बिल्लियों की एक मंडली के अभिनय में।

YouTube पर सब्सक्राइब करें

और कहानियाँ