मुंशी प्रेमचंद · 1925 · 3 मिनट का वीडियो

नमक का दारोगा – प्रेमचंद की कहानी का सारांश, पात्र और उद्देश्य (कक्षा 11)

इलाक़े का सबसे अमीर आदमी तस्करी करते पकड़ा जाता है। वह नौजवान दारोग़ा को मुँहमाँगी क़ीमत देने को तैयार है। दारोग़ा मना कर देता है, और उसे इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है। लगभग।

मूल कहानी का सारांश

जब नमक पर सरकारी पाबंदी लगी, तो नमक विभाग का दारोग़ा बनना सबसे फ़ायदे की नौकरी हो गई, ऊपरी कमाई की वजह से। नौजवान मुंशी वंशीधर को यह नौकरी मिलती है। उनके बूढ़े, क़र्ज़ में डूबे पिता समझाते हैं कि ओहदे पर नहीं, ऊपरी आय पर ध्यान देना: मासिक वेतन पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखता है और घटते-घटते ग़ायब हो जाता है; ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है, जिससे हमेशा प्यास बुझती है।

वंशीधर ईमानदार हैं और यह सलाह नहीं मानते। एक रात उन्हें यमुना के पुल पर गाड़ियों की आवाज़ सुनाई देती है। गाड़ियाँ पंडित अलोपीदीन की हैं, इलाक़े के सबसे अमीर और रसूख़दार आदमी, और उनमें चोरी का नमक भरा है।

अलोपीदीन को यक़ीन है कि पैसा हर काम बना देता है। वे एक हज़ार रुपये से शुरू करते हैं और रक़म बढ़ाते-बढ़ाते चालीस हज़ार तक पहुँच जाते हैं। वंशीधर हर बार मना करते हैं और उन्हें गिरफ़्तार करवा देते हैं।

पूरा शहर हैरान है। अदालत में अलोपीदीन का पैसा और रसूख़ जीत जाता है: वे बरी हो जाते हैं और जज उल्टा वंशीधर को ज़रूरत से ज़्यादा जोश दिखाने के लिए फटकारते हैं। वंशीधर नौकरी से निकाल दिए जाते हैं। पिता ग़ुस्से में हैं और घर में मातम है।

क़रीब एक हफ़्ते बाद अलोपीदीन का रथ वंशीधर के दरवाज़े पर आता है। सबको लगता है कि बदला लेने आए हैं। पर अलोपीदीन उन्हें अपनी पूरी जायदाद का स्थायी मैनेजर बनने का प्रस्ताव देते हैं: छह हज़ार रुपये सालाना वेतन, रहने को घर, नौकर-चाकर और घोड़े। उन्हें अपनी जायदाद के लिए एक ईमानदार आदमी चाहिए था, और वह उन्हें मिल गया। वंशीधर की आँखें भर आती हैं और वे प्रस्ताव मान लेते हैं।

हमारा वीडियो कैसे अलग है

हमारे वीडियो में कहानी आज के एक बंदरगाह पर है। दारोग़ा का नाम वैंस है, अरबपति का एल्डन, और "ख़ाली" लिखे चालीस ट्रकों में नमक की जगह सोना भरा है। रिश्वत है एक ख़ाली चेक: जो रक़म चाहो लिख लो।

अंत प्रेमचंद वाला ही है: जो आदमी बिका नहीं, वही अरबपति को अपने काम के लिए चाहिए।

पात्र

मुंशी वंशीधर (वैंस)
नौजवान नमक दारोग़ा। ईमानदार, चाहे नौकरी ही क्यों न चली जाए।
पंडित अलोपीदीन (एल्डन)
इलाक़े के सबसे अमीर आदमी। मानते हैं कि हर चीज़ की क़ीमत होती है, और ग़लत साबित होकर हैरान रह जाते हैं।
वंशीधर के पिता
ग़रीब, दुनियादार, और मानते हैं कि ईमानदारी से घर नहीं चलता।

कहानी के विषय

ईमानदारी बनाम पैसा

वंशीधर चालीस हज़ार के ऊपर अपना फ़र्ज़ चुनते हैं और नौकरी गँवाते हैं। कहानी पूछती है: ईमानदारी बेवक़ूफ़ी है या अनमोल?

भ्रष्टाचार

रिश्वत पूरे सिस्टम में है: नौकरी में, अदालत में, यहाँ तक कि पिता की सलाह में भी।

सम्मान

अलोपीदीन किसी को भी ख़रीद सकते हैं, इसीलिए वे उस अकेले आदमी की क़द्र करते हैं जिसे नहीं ख़रीद सके।

कहानी के अंत का मतलब

अलोपीदीन वंशीधर को इसलिए नौकरी देते हैं क्योंकि उनकी ईमानदारी दुर्लभ है। जो चालीस हज़ार में नहीं बिका, उसी पर वे अपनी पूरी दौलत का भरोसा कर सकते हैं।

प्रेमचंद यह नहीं दिखाते कि अदालत में ईमानदारी जीतती है, वह नहीं जीतती। पर वे बताते हैं कि आख़िर में उसकी पहचान होती है, उन लोगों से भी जो उसके ख़िलाफ़ थे।

छात्रों के सवाल

'नमक का दारोगा' कहानी का मुख्य पात्र कौन है?

मुंशी वंशीधर, एक नौजवान और ईमानदार नमक दारोग़ा।

अलोपीदीन ने कितनी रिश्वत की पेशकश की?

एक हज़ार रुपये से शुरू करके चालीस हज़ार तक। वंशीधर ने सब ठुकरा दिया।

वंशीधर को नौकरी से क्यों निकाला गया?

अदालत में अलोपीदीन बरी हो गए और वंशीधर पर ज़रूरत से ज़्यादा जोश दिखाने का आरोप लगा, इसलिए उन्हें निकाल दिया गया।

अलोपीदीन ने वंशीधर को नौकरी क्यों दी?

वंशीधर की ईमानदारी से प्रभावित होकर। उन्होंने उन्हें छह हज़ार रुपये सालाना पर अपनी जायदाद का स्थायी मैनेजर बनाया।

'नमक का दारोगा' किस कक्षा में है?

यह NCERT की कक्षा 11 की हिंदी पुस्तक आरोह (भाग 1) का पहला पाठ है।

वंशीधर के पिता ने वेतन को क्या कहा?

पूर्णमासी का चाँद, जो एक दिन दिखता है और फिर घटते-घटते ग़ायब हो जाता है। ऊपरी आय को उन्होंने बहता हुआ स्रोत कहा।

मूल कहानी: नमक का दारोग़ा, मुंशी प्रेमचंद (1925).

हर हफ़्ते नई कहानी, हर दिन नया Short

चेख़व, पो, प्रेमचंद और बाक़ी उस्तादों की कहानियाँ, बिल्लियों की एक मंडली के अभिनय में।

YouTube पर सब्सक्राइब करें

और कहानियाँ